बार-बार आता है गुस्सा और चिड़चिड़ापन? 5 मिनट का भ्रामरी प्राणायाम दे सकता है मन को सुकून

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। काम का दबाव, नींद की कमी और लगातार बदलती दिनचर्या का असर सिर्फ शरीर पर नहीं, बल्कि हमारे मूड पर भी पड़ सकता है। कई लोगों में इसका असर चिड़चिड़ापन, बेचैनी और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आने के रूप में दिखाई देता है।
ऐसे में योग और सांस से जुड़े अभ्यास कुछ लोगों को रिलैक्स करने और खुद को शांत करने में मदद कर सकते हैं। भ्रामरी प्राणायाम भी ऐसी ही एक तकनीक है, जिसमें सांस छोड़ते समय भंवरे जैसी गूंज वाली आवाज निकाली जाती है।
क्या है भ्रामरी प्राणायाम?
‘भ्रामरी’ शब्द ‘भ्रमर’ यानी भंवरे से जुड़ा है। इस प्राणायाम में सांस छोड़ते समय मुंह बंद रखते हुए धीमी और लगातार गूंज वाली ध्वनि उत्पन्न की जाती है।
इस दौरान व्यक्ति का ध्यान सांस और आवाज पर रहता है, जिससे कुछ लोगों को मानसिक रूप से शांत महसूस करने में मदद मिल सकती है।
भ्रामरी प्राणायाम कैसे करें?
- शांत और हवादार जगह पर आराम से सीधे बैठें।
- आंखें बंद करके शरीर को रिलैक्स करें।
- कुछ सेकंड सामान्य रूप से सांस लें।
- अब धीरे-धीरे गहरी सांस लें।
- सांस छोड़ते समय मुंह बंद रखें और ‘म्’ जैसी गूंज वाली आवाज निकालें।
- आवाज को सहज रखें, बहुत तेज आवाज निकालने की जरूरत नहीं है।
- पूरा ध्यान सांस और कंपन की अनुभूति पर रखें।
- सांस पूरी होने के बाद सामान्य रूप से दोबारा सांस लें।
- शुरुआत में 3-5 बार इसका अभ्यास किया जा सकता है।
- असहज महसूस होने पर तुरंत रुक जाएं।
भ्रामरी के संभावित फायदे
नियमित और सही तरीके से किए गए श्वास अभ्यास कुछ लोगों के लिए रिलैक्सेशन और तनाव प्रबंधन में मददगार हो सकते हैं। भ्रामरी से जुड़े संभावित फायदे हैं:
- तनाव और मानसिक बेचैनी को संभालने में मदद
- मन को शांत महसूस कराने में सहायता
- ध्यान और माइंडफुलनेस के अभ्यास में मदद
- सांस पर ध्यान केंद्रित करने की आदत विकसित करना
- रिलैक्सेशन का अनुभव
हालांकि, भ्रामरी को गुस्सा, एंग्जायटी, माइग्रेन या हाई ब्लड प्रेशर का इलाज नहीं माना जाना चाहिए। लगातार या गंभीर समस्या होने पर डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।
अभ्यास करते समय इन बातों का रखें ध्यान
भ्रामरी करते समय कान के अंदर उंगली न डालें। अगर हाथों का इस्तेमाल कर रहे हैं तो कान के बाहरी हिस्से पर केवल हल्का दबाव रखें।
सांस छोड़ते समय आवाज को जबरदस्ती तेज करने या सांस को रोकने की जरूरत नहीं है। अभ्यास हमेशा आरामदायक तरीके से करें।
अगर चक्कर, घबराहट, कान में दर्द या किसी अन्य तरह की परेशानी महसूस हो तो अभ्यास रोक दें।
गुस्से को तुरंत खत्म करने के बजाय, रोज कुछ मिनट खुद को शांत करने की आदत बनाना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
